नागपंचमी की पौराणिक कथाएं बताती है नागपंचमी का महत्व।
| नागपंचमी |
सृष्टि के विषिले जीवों के प्रति भी हमारी संवेदना भूतदया को जागृत रखती है। इसलिए हम नागपंचमी जैसे त्यौहारों को मनाते है। हम नागपंचमी की पौराणिक कथाएं, उससे जुड़ी धारणाएं और नागपंचमी का जीवन में महत्व को समझेंगे। पुराणों में वर्णित नागपंचमी की पौराणिक कथाएं आप के सामने प्रस्तुत है।
साथ ही नागपंचमी के इन कथाओं को सुनने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का हमेशा वास होता है।
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं। –१
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं के अनुसार पुराणों के अनुसार ऋषि कश्यप और उनकी कद्रू नामक एक पत्नी के द्वारा नागों कि उत्पति हुई। उनकी ९ संतानों को नागों की नौ कुलों में देखा जाता है। अग्नीपुराण में नागों के ८० कूलों का भी वर्णन है।ऋषि कश्यप और कद्रु द्वारा उत्पन्न शेष (अनंत), वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, महापद्म, शंख, चुड़ और धनंजय पुत्रों के नाम से ही उनके कूलों को जाना जाता है।
माता कद्रु द्वारा अपने सौतेली मां वनिता को पीड़ा पहुंचाने से शेषनाग(जिसे अनंत नाम से भी जाना जाता है) दुखी हुए और अपने माता और भाइयों को छोड़ गंधमाधन पर्वत पर तपस्या करने लगे। कठोर तपस्या के बाद ब्रम्हा जी प्रसन्न हुए। और ब्रम्हा जी ने पृथ्वी को धारण कर स्थिर करने के लिए कहां। उनके पृथ्वी को धारण करते ही डगमगाने वाली पृथ्वी स्थिर हो गई।
इसलिए उनके आभार प्रकट करने के लिए सारे धरतीवासी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी को नागपंचमी का उत्सव मनाते है। नागपंचमी की पौराणिक कथाएं हमें भूतदया सिखाती है जिस में सृष्टि के हर प्राणीओं के प्रति आदर भाव व्यक्त होता है।
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं।–२
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं जिस में महाभारत के पर्व में भगवान कृष्ण द्वारा कालिया मर्दन कि है। भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं में से एक कालिया मर्दन की कथा रोचक तथा भुतदया से प्रेरित कथा है।गोकुल में नंदबाबा और मैया यशोदा के घर भगवान कृष्ण का बचपन बीता। यमुना तट पर बसे गोकुल के वनों में भगवान अपने सखाओं के साथ गैया चराने जाते थे।और वहां गैयों को छोड़कर सब खेलते थे।काफी दिनों से गाव में चर्चा थी कि कालिया नामक एक विशालकाय नाग यमुना के पात्र में रहने आया है। जिसके विष से यमुना का पानी जहरीला हो रहा है और उसके पीने से गैया और गाव के लोग प्रभावित हो रहे है। कालिया के जहर से अपने गाव और गायों की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने एक दिन जानबूझकर गेंद को यमुना के पानी में फेंक दिया और गेंद निकालने के बहाने यमुना में कूद गए। उन्हे यमुना के पानी में कूदते देख सब भयभीत हो गए। और गाव में इसकी सूचना दी। सूचना मिलते ही नंदबाबा और मैया यशोदा के साथ पूरा गोकुल यमुना के तट पर रुदन कर रहा था।
और इधर कालिया नाग आराम कर रहा था। एक सुकोमल बालक को देख कालिया कि पत्नियां आश्चर्यचकित रह गई। और उस बालक को(भगवान कृष्ण को) कालिया के कोप से बचाने के लिए उसके पास गई और उसे जल्दी लौट जाने को कहा।किन्तु भगवान कृष्ण ने उनके बातों को अनसुना कर कालिया को युद्ध के लिए ललकारा। कालिया जाग गया और अपने सामने मनुष्य देख क्रोधित हो गया। भगवान और कालिया के बीच घनघोर युद्ध हुआ।
जिसमे कालिया परास्त हो गया। यह साधारण बालक नहीं है यह जानकर अपनी मृत्यु को समीप देखकर भगवान से याचना करने लगा। ” हे प्रभु , समुद्र के तटीय प्रदेश में गरुड़ द्वारा हानि पहुंचने पर वह स्थान छोड़कर मै आया हूं।, इस यमुना के में पात्र सुरक्षित स्थान पाकर यहां रहने लगा हूं। मुझे अभयदान दे।” तब भगवान कृष्ण ने उसे कहां , ” इस युद्ध के दौरान मेरे पदचिन्ह तुम्हारे मस्तक पर अंकित हो गए है। तुम बिना किसी भय के समुद्र के तटीय प्रदेश में जाओ। मेरे पदचिन्हों को देखकर पक्षीराज गरुड़ तुम्हे वंदन करेगा। तुम्हे कोई हानि नहीं पोहचाएगा।” यह सुनकर नागराज कालिया ने प्रभु को वंदन किया और वहां से चले गए।
यमुना का जल फिर से पवित्र हो गया।यह दिन श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन था। इसलिए इस दिन कालिया के पूजन तथा विसर्जन कि विधि को किया जाता हैं। जिसे हम नागपंचमी कहते है। नागपंचमी की पौराणिक कथाएं में अपने क्षमाशील और भूतदया जैसे गुणों को विक्सित करने की प्रेरणा देता है।
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं। –३
ब्रम्हांड पुराण में नागपंचमी की पौराणिक कथाएं में वर्णित एक कथा को भी नागपंचमी की कथाओं में प्रचलित है।समुद्र मंथन में देवताओं ने नागों के राजा वासुकी को मंथन कि रस्सी बन ने के लिए याचना की तब वासुकी मान गए। किन्तु उनकी माता ने उन्हें मना कर दिया। फिर भी माता की अवज्ञा कर नागों ने समुद्रमंथन में सहायता की। इसलिए उनकी माता ने श्राप दिया कि एक राजा के सर्पसत्र यज्ञ में नागों का कुल जलकर भस्म हो जाएगा। यह सुनकर सब नाग दुखी हो गए। और उपायों कि खोज में ब्रम्हा जी के पास गए। ब्रम्हा जी ने उन्हें कहा कि नागकुल में एक तपस्वी जिनका नाम आस्तिक मुनि होंगे। जो जन्मेंजय राजा के सर्पसत्र को रोक कर नागों के प्रजाति का रक्षण करेंगे।जब जनमेंजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पसत्र का आयोजन किया। और नागों की प्रजातियों को समाप्त करने लगा। तब आस्तिक मुनि ने अपनी विद्वता से जन्मेंजय का क्रोध शांत कर सर्प सत्र को रुक आया।अग्नि से पीड़ित नागों के देहपर दूध डाला। जिससे उनका शरीर शांत हो गया। तब सब नागों ने आस्तिक मुनि को वचन दिया। जो भी व्यक्ति आस्तिक शब्द का तीन बार उच्चारण करेगा। उस वह दंश नहीं करेंगे। और श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन जो भी उनकी मनोभावे पूजा करेगा उसे इच्छित फलों की प्राप्ति होगी। इसलिए भी श्रावण के पंचमी को नागपंचमी का त्यौहार मनाते है। इसलिए यह भी कह सकते है की नागपंचमी की पौराणिक कथाएं हमें काफी कुछ बातें सिखाती है।
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं। – ४
लोक कथाओं में भी कई नागपंचमी की पौराणिक कथाएं प्रचलित है उस में किसान द्वारा अपने खेत में हल चलाते वक्त अनजानें में सापों के तिन बच्चों की मृत्यु हो जाती है। जिसे देखकर उन सापों की माता काफी दुखी हो जाती है और अपने बच्चे के मृत्यु का बदला लेने का विचार करती है। जिस तरह इस किसान नें मेटे पुत्र की हत्या की उसी तरह में भी इस किसान के पुत्रों को मृत्यु प्रदान करुँगी ऐसा प्रण लेती है।एक दिन रात्रि के समय जब किसान अपने परिवार के साथ सोया हुआ होता है ता वह सर्पों की माता उस के घर में प्रवेश कर के उस किसान के दोनों पुत्रों को डस देती है जिस में किसान पुत्रों की मृत्यु हो जाती है।अपने पुत्रों का बदला पूर्ण होने पर वह सर्पों की माता वहां से जाने लगती है। लेकिन यह सारी बातें उस किसान की पुत्री देख लेती है और उस नागमाता क सामने जाकर उसे दुग्ध अर्पण करती है और अपने पिता सिर्फ कर्त्तव्य का पालन कर रहे थे उन्होंने जानबूझकर आप के पुत्रों की हत्या नही की बस वह अंजाने में हुआ हादसा था यह बताती है और अपने पिता से अनजाने में हुए अपराध के लिए क्षमायाचना करती है।
किसान पुत्री की दीन वाणी सुनकर सर्पोंकी माता को दया आती है और वह अपने द्वारा दण्डित किसान और किसान पुत्रों को क्षमा कर उने पुनर्जीवित कर देती है। इसीलिए श्रावण मास की पंचमी को नागों और सर्पों के प्रति सम्मान के भाव प्रगट करने हेतु नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है।
कृषिप्रधान संस्कृति से जुड़ा है नागपंचमी का महत्व।
हमारे कृषिप्रधान संस्कृति से नागपंचमी का महत्व इसलिए जुड़ा होता है क्योंकि नाग या सर्प किसानों के मित्र होते है। खेतों में बोए बीज को चूहे, किटक खा जाते हैं। इसलिए फसल उग नहीं पातीं। और किसानों का काफ़ी नुकसान होता है।
लेकिन साप और नाग जैसे जीव इन छोटे जीवों को खाकर किसानों कि काफी मदद करते है। किसानों की फसल को बचाते है। इसलिए कृतज्ञता वश नागों की पूजा करने कि, उन्हे सम्मान देने की ऐसी प्रथाओं का जन्म हुआ होगा।
नागपंचमी से जुड़ी कुछ धारणाएं
शास्त्रों से जुड़ी बातों में नागदेवता को धन का रक्षक कहां जाता था। और आज भी यह धारणा प्रचलित है। नाग देवता धन और समृद्धि का कारक है। वर्षा ऋतु में श्रावण के पहले फसल बोई जाती है। और फसल बोने के बाद नागदेवता की पूजा कर धन, समृद्धि की कामना करने हेतु नागपंचमी के त्यौहार को मनाया जाता होगा। जिस का महत्व नागपंचमी की पौराणिक कथाएं हमें बताती है।गलत तरीको से मनाए जा रही है नागपंचमी।
पहले तो नाग या साप जैसे जीव मांसाहारी होते है। वह दूध नहीं पीते। यह हमको समझना होगा। उन्हे पकड़कर भूखा प्यासा रखकर नागपंचमी के दिन लोगों द्वारा दूध पिलाने को विवश किया जाता है। पैसे कमाने की उद्देश्य से साप और नाग जैसे प्रकृति पूरक जीवों के हाल किए जाते है। उनको पकड़ा जाता है। मारा जाता है।यह उत्सव उन जीवों के प्रति भूतदया से प्रेरित कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए है। इसलिए हमें समझना होगा।उनके प्रति संवेदना को व्यक्त करना होगा। और उनकी रक्षा कर, संवर्धन कर इस त्यौहार को मनाना होगा।
सांपों अथवा नागों को पकड़ना और मारना सरकार द्वारा गैरकानूनी और अपराध माना गया है। उनको पकड़ने या मारने पर आपको कानूनी करवाई के तहत कारावास भी हो सकता है।
नागपंचमी के दिन इस मंत्र को पढ़कर ध्यान करे
अनंतं वासुकि शेष पद्मनाभं च कम्बलम्।
शड्खपाल धार्तराष्ट्र तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः।।
तस्मे विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयीं भवेत्।
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