हमारे जीवन में भगवान कृष्ण के उपदेशों का क्या है महत्व।
श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी
“कृष्ण् इति अकर्षियति” सारे संसार को आकर्षित करने वाले भगवान कृष्ण के जन्म दिवस को जन्माष्टमी के रूप में पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। अलग अलग जगहों पर अलग अलग प्रथाओं और पारंपरिक तरीकों से भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। भगवान कृष्ण का पूरा जीवन ही सांसारिक मानव के लिए उपदेश है। श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी में जानेंगे भगवान कृष्ण के संक्षिप्त गीता के उपदेश।
श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी में हम भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में खुद से हारे हुए अर्जुन को कर्तव्य पालन तथा स्थितप्रज्ञता का जो उपदेश दिया वह संक्षिप्त रूप में जानेंगे जो संसार में “श्रीमद भगवत गीता” इस उपनिषद् के नाम से प्रख्यात है। “भगवत गीता” संसारिक मानव के लिए जीवन पथदर्शक बनती आई है और आगे भी हमारे जीवन के संचलन में पथदर्शक बनती रहेगी। और हमें जीवन की सफलता के लिए हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
अर्जुन के मोह की हतबलता।
कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन ने अपने सारथी बने भगवान कृष्ण को अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच में के जाने को कहा तो भगवान कृष्ण मन ही मन यह जान गए थे। की मोह की हतबलता से अर्जुन ग्रसित होने वाले है। फिर भी भगवान कृष्ण ने रथ को कौरव और पांडव सेनाओं के बीच रथ ले जाकर अर्जुन को दोनों सेनाओं का मुआयना करने को कहां।
दोनों सेनाओं में अपने परिजनों को, गुरुजनों को, भाईयो तथा मित्रों को, कुल के बुजुर्गों और बच्चों को देख मन में आसक्ति तथा मोह उत्पन्न हो गया। और अर्जुन दुःखी हो गया। और भगवान से कहने लगा, “अगर अपनों को ही मारकर विजय प्राप्त करनी है। अपने परिजनों के शवों पर ही अगर विजय श्री का आनंद उठाना है तो यह युद्ध उसे नहीं करना” यह कह कर अर्जुन ने अपना गांडीव नीचे डाल दिया और खुद मन से दुखी होकर रथ पर बैठ गया।
अपने कर्तव्यों के प्रति अर्जुन की उदासीनता को देखकर भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कर्तव्यों, स्थितप्रज्ञता और विरक्तता तथा निष्काम कर्मयोग का जो उपदेश दिया उसे हि “गीता का उपदेश”कहां गया है। जिसे कृष्णपायान श्री वेद व्यास जी ने संकलित कर लेखनी बद्ध किया है।
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| श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी |
भगवान कृष्ण के(गीता के) कुछ उपदेश। श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी
आसक्ति विरहित कर्म के लिए बुद्धि को स्थितप्रज्ञ करना ही मन की लालसा और स्वार्थ तथा दुःख को नियंत्रित कर सकता है।
प्रकृति के तीनों गुणों में (सत्व, रजस और तामस) व्यक्ति कर्म करने के लिए बाध्य है। कर्म को त्याग कर मन ही मन उसकी निरंतर कामना को मिथ्याचार कहते है।
ज्ञान से प्रेरित आसक्ति विरहित कर्म के माध्यम से मन को शाश्वत संन्यास की ओर ले जाना ही जीवन का ध्येय है।
आसक्ति विरहित कर्म और ज्ञान के माध्यम से बाह्य इन्द्रियों को संयमित कर सुख या दुःख की स्थिति में मन की समान अवस्था का होना आवश्यक है।
प्रकृतिमें आठ तत्वों ( जल,पृथ्वी,वायु,अग्नि,आकाश,मन,अहंकार और बुद्धि) को चेतना की प्राप्ति होते ही नौवें तत्व को जन्म देती है जीसे जीवन कहते है। और इन तत्वों का चेतना से अलग होना ही मृत्यु है। जो प्रकृति का निर्धारण है। कोई कर्तव्य या व्यक्ति बस निमित्त मात्र है।
सत्व, रजस और तामस जैसे तत्वों के गुणों को धारण कर अच्छे और बुरे कर्म में विचरीत चेतना ही ईश्वरीय संज्ञा है। जो तत्वों के अलग हो जाने पर शुद्ध चेतन अवस्था को प्राप्त करती हैं। वहीं ईश्वर है।
सृष्टि द्विविरुद्ध रूप की कल्पना मात्र है जो हमें एक प्रकाश तो दूसरा अंधेरा, एक सत्य तो दूसरा असत्य, एक धर्म तो दूसरा अधर्म, बन्ध और मोक्ष, कार्य और अकार्य, वृत्ति और निवृत्ति तथा जन्म और मृत्यु से दर्शित होती है।
कर्म करते हुए मन का आसक्त होना स्वाभाविक है किन्तु बुद्धि को अतिसूक्ष्म आत्मा के अधीन करना जो मन को विरक्त अवस्था का ज्ञान देता है उसे ही अनासक्त कर्म की संज्ञा दी जाती है।
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गीता उपदेश। श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी
गीता का उपदेश उस अर्जुन के लिए था जो विपदा के समय अपने धैर्य को गलत धारणाओं में खो बैठा था। उसे कर्तव्यपथ पर लाने अथवा कर्मो के महत्व को समझाने भगवान कृष्ण ने उसके सामने उच्चतम ज्ञान के भंडार को खोल कर अर्जुन को मन और कर्म से उत्साहित किया और उसे मानवी जीवन मूल्यों के प्रति कर्म की प्रतिबद्धता को भी अवगत कराया। श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी का यह उपदेश आज भी मानव कल्याण के उत्थान का मार्ग प्रगट करता है।
परिवर्तन संसार का नियम है।
प्रकृति समय और काल के परिवर्तन के अधीन रहकर तत्वों के बिजों में चेतना को प्रस्थापित करती है। जिसके कारण भिन्न स्वभाव गुणों का विकास होता है। और सृष्टि के द्वी विरुद्ध रुपों का आकर्षण तत्वों के गुणों के आधार पर होता है।
निष्काम कर्मयोग।
मानवी मूल्यों में कर्तव्य का पालन तथा असक्तिरहित कर्म की प्रतिबद्धता को प्रमाण माना है। जो मन और बुद्धि के द्वारा आत्मकेंद्रित किए जाते है। भगवान कृष्ण जिस निष्काम कर्मयोग की बात गीता में करते है वह हमारे बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित कर फलविरहित कर्म की ही बात है। जिसे मन विकारों में नहीं बन्ध सकता। और सुख और दुःख में भी खुद को नियंत्रित रख सकता है।
चेतना ही ईश्वरीय संज्ञा है।
भगवान कृष्ण मन की चेतना अथवा आत्मचेतना को ही ईश्वरीय संज्ञा देते है। जो कि भौतिकता से अलीप्त है। और अनासक्त तत्व की कारक है। जो प्रकृति द्वारा हमारे आठ तत्वों को प्राप्त होकर जीव तत्व में सम्मिलित होती है।
फलविराहीत कर्म।
भगवान कृष्ण गीता में ज्ञान से प्रेरित आसक्ति को नियंत्रित करने हेतु फालविरहित कर्म की चर्चा करते है। जिससे मन की सांसारिक निवृत्ति को संन्यास की उपमा देते है।
कर्मफल की आसक्ति।
कर्मफल की चिंता दुखों तथा वासना विकार और अहंकार की कारक है जिसे मिथ्याचार कहा गया है। विषय वासना में आसक्त व्यक्ति सांसारिक उपभोग्यता को महत्व देता है। जिसके कारण दुःख पीड़ा और विनाश का कारण बनता है।
श्री कृष्ण उपदेश इन हिंदी में भगवान कृष्ण द्वारा दिए गए उपदेश को हम हमारे सांसारिक जीवन का मार्गदर्शक बना सकते है। जीवन यापन की प्रक्रिया में मानवीय जीवन के मूल्यों और धारणाओं को समझना और जीवन को दिशानिर्देशित करने हेतु गीता के ज्ञान की परम आवश्यकता हमारे जीवन में है।
धन्यवाद …
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