क्या आप जानते है गणेश गीता का रहस्य।
भगवान गणेश की हम जितनी सरलता से साधना करते है उतने सरलता से भगवान गणेश हमपर प्रसन्न होते है। किन्तु भगवान गणेश जितने सरल और सहज देवता है उस से ज्यादा कई गूढ़ और रहस्यमयी तत्वों से उनका जुड़ाव है।
भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अपने सखा पार्थ को गीता का उपदेश कर उसे कर्तव्य की शिक्षा का ज्ञान दिया था यह आप सभी जानते है।भगवान नारायण ने सूर्य तथा सूर्य ने विवस्वत मनु को गीता का उपदेश दिया था यह भी आप सभी जानते है।
पर क्या आप जानते है की भगवान गणेश ने भी राजा वैरण्यक को गीता का उपदेश देकर उसे मोक्ष की प्राप्ति प्रदान कि थी। हम और आप में से बहुत कम लोग जानते है कि वैरण्यक के पुत्र के रूप में आए भगवान गणेश ने अपने पिता वैरण्यक को गीता का उपदेश देकर मुक्ति दिलाई थी।
जो संसार में “गणेश गीता” के नाम से प्रख्यात है।
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राजा वैरण्यक और उसके पुत्र गणेश की कथा।
राजा वैरण्यक और देवी पुष्पिका उनके पिछले जन्म में गणेश जी को पुत्र रूप में प्राप्ती तथा मोक्ष प्राप्ति हेतु भगवान गणेश का कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वह उनके अगले जन्म में उनके घर पुत्र रूप में अवतरित होंगे। और राजा वैरण्यक और देवी पुष्पिका के घर भगवान गणेश का अवतरण हुआ।
राजा वैरण्यक के घर कैसे हुआ भगवान गणेश का अवतरण।
राजा वैरण्यक बड़े ही दानशुर तथा प्रजहितदक्ष राजा थे। और उनकी पत्नी देवी पुष्पिका सुशील और पतिव्रता नारी थी। देवी पुष्पिका ने प्रसूति हेतु वनगमण की ईच्छा व्यक्त की। राजा ने प्रसन्न भाव से सब इंतजाम कर सैनिकों और दासियों के संरक्षण में देवी पुष्पिका को प्रसूति हेतु वनगमण के लिए भेज दिया। वन में रहते प्रसन्नचित भाव से रानी पुष्पुका वन में विहार करती थी।
प्रसुतीकाल समीप आ गया। उन्हे वेदनाएं होने लगी। (उसी समय कैलाश में माता जगदंबा ने भी एक पुत्र को जन्म दिया।) वन में जब रानी पुष्पिका ने एक पुत्री तो जन्म दिया और रानी पुष्पिका मूर्छित हो गई। तभी गुप्त रूप से वहां एक राक्षसी आ गई और रानी पुष्पिका के समीप रो रही पुत्री को उठाकर चली गई। तभी भगवान शिव के संकेतों से शिवगणों ने माता जगदंबा के पुत्र को उठाकर गुप्त रूप से रानी पुष्पिका के गोद में रखकर चले गए। जब रानी पुष्पिका को होश आया तो उन्हों ने चार हात वाले बालक को समीप देख भयभीत हो कर इसे अपशकुन समझने लगी। राजा वैरण्यक को जब इस बात का पता चला तब वह वन में आए और अपनी रानी का ढाढस बढ़ाते हुए उस पुत्र को वन में ही त्याग देने को कहा और दोनों ने उस पुत्र को वन में ही त्याग कर अपने महल में लौट आए।
जब राजा वैरण्यक को हुआ अपने पुत्र का बोध।
पुत्र वन में त्याग देने के बाद महर्षि पाराशर को वह बालक मिला और उन्होंने उसका पालन पोषण किया। उस बालक की ज्ञान और बल की कीर्ति सारे संसार में वृद्धिगंत हो गई। उस अवतार में भगवान गणेश ने सिंदुरा नामक दैत्य का वध कर अवतार कार्य को सफल किया। उनकी कीर्ति राजा वैरण्यक के कानों पर पड़ी और उनकी जन्मकथा जानने के बाद उसे विश्वास हो गया यह हमारा ही पुत्र है। तब राजा वैरण्यक फुट फुट कर रोने लगे अपने भाग्य को कोसने लगे और अपने पुत्र को क्षमायाचना करने महर्षि पाराशर के आश्रम गए।
| गणेश गीता |
भगवान गणेश ने दिया राजा वैरण्यक को गीता का उपदेश।
राजा वैरण्यक जब महर्षि पाराशर के आश्रम आए और गणेश जी से उनकी क्षमायाचना कर उन्हें घर चलने को कहां तब भगवान गणेश ने उन्हें उनके पिछले जन्म का ज्ञान करवाया और उन्हें गीता के ज्ञान का उपदेश दिया।
क्या है गणेश गीता का उपदेश।
जिस तरह भगवान कृष्ण ने मन के विकारों के अधीन अर्जुन को कर्तव्य के पथ पर चलने के लिए गीता का उपदेश किया था। और अर्जुन ने अपने कर्तव्यों के लिए युद्ध किया। उससे भिन्न गणेश गीता में भगवान गणेश के उपदेशों से राजा वैरण्यक भावों, बन्ध, विकार, ईच्छा, तथा दोषों को त्याग कर मोक्ष को प्राप्त हो गए।
गणेश गीता के ११ ( ग्यारह) अध्यायों में ४१४ श्लोकों में भगवान गणेश ने राजा वैरण्यक को मुक्ति तथा मोक्ष का मार्ग बताया है।
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गणेश गीता के ११ अध्यायों का संक्षिप्त विवरण।
गणेश गीता के सांख्यसारार्थयोग नाम के पहले अध्याय में भगवान गणेश ने राजा वैरण्यक को बुद्धि की स्थिरता, मन की शांति तथा योग और क्रिया को परिभाषित किया।
गणेश गीता के कर्मयोग नाम के दूसरे अध्याय में भगवान गणेश ने कर्म के महत्व को समझाते कायिक,वाचिक तथा मानसिक कर्म की अलिप्तता का मार्ग बताया।
भगवान गणेश ने गणेश गीता के ज्ञानयोग नाम के तीसरे अध्याय में अपने अवतारों के रहस्य को राजा वैरण्यक के सामने उजागर करते हुए अवतारों की महत्ता का वर्णन किया है।
वैधसंन्यासयोग नाम के चौथे अध्याय में भगवान गणेश जी ने राजा वैरण्यक को अवलोम विलोम का भेद बताकर प्राणायाम तथा योगाभ्यास के महत्ता को वर्णित किया।
गणेश गीता के योगवृत्तिप्रशंसन्योग नाम के पांचवें अध्याय में भगवान गणेश ने योगाभ्यास से श्वसन गति की अनुकूलता तथा प्रतिकूलता को दर्शित कर आंतरिक तथा बाह्य विकारों से निपटने का मार्ग बताया।
भगवान गणेश राजा वैरण्यक को बुद्धियोग नाम के षठे अध्याय में ज्ञान की जिज्ञासा से ईश्वरीय तत्व को पाने की अभिलाषा तथा चेेेतना की सगुण अवस्था से निर्गुण निराकार की ओर अग्रसर होने को ही पूर्ण मोक्ष की राह बताया है।
राजा वैरण्यक का वैराग्य देख भगवान गणेश जी ने गणेश गीता के उपासनायोग नाम के सातवें अध्याय में मन, बुद्धि तथा बाह्य शुद्धता के लिए उपासना का महत्व बताया है।
दर्शनयोग नामक आंठवे अध्याय में भगवान गणेश जी ने राजा वैरण्यक को विराट रूप का दर्शन करा कर कृतकृत्य कर दिया। भगवान गणेश जी के विराटरूप दर्शन से राजा वैरण्यक के विकारों को पूरी तरह नष्ट कर उन्हे स्थिरता प्रदान की।
सात्विक, राजसी और तामसी भावों में मनुष्य देह की प्रबलता तथा दुर्बलता को प्रदर्शित कर उस आचरण के भावों को प्रगट करता भावयोग नाम का नौवां अध्याय भगवान गणेश ने राजा वैरण्यक को बताया।
भगवान गणेश जी ने राजा वैरण्यक को गणेश गीता के दसवें उपदेशयोग नाम के अध्याय में मानवी दोषों को ही नरक का मार्ग बताया है। मद्, मोह, मत्सर, क्रोध, ईर्ष्या, वासना, दंभ जैसे दोषों का त्याग कर सत्य, सदाचार, सद्वीवेक जैसे गुणों को खुद में विकसित करना ही मुक्ति का साधन बताया है।
अन्तिम और ग्यारहवें निरुपनयोग नामक अध्याय में भगवान गणेश जी ने मानवीय तपाचरण तथा मानवी उद्धार के बारे में बताया है। काया, वाचा और मन से ईश्वरीय आराधना का सात्विक तपाचरण इंसान के लिए मुक्ति के द्वार खोल देता है।
गणेश गीता को सुनकर राजा वैरण्यक की बुद्धि स्थिर हो गई। और उन्होंने अपने काया वाचा मन को गणेश भक्ति में लीन कर लिया और पूर्ण रूप से मोक्ष को प्राप्त हो गए। राजा वैरण्यक को उपदेश करने उपरांत भगवान गणेश अपने धाम कैलाश चले गए।

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